आजम खान – जेल यात्रा से कमल यात्रा की ओर

भारतीय राजनीति में कुछ ऐसे चेहरे होते हैं जो संघर्ष, विवाद और कूटनीति के धुरंधर खिलाड़ी होते हैं. उत्तर प्रदेश की राजनीति में आजम खान का नाम ऐसा ही एक नाम है. एक वक्त समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता रहे आजम खान ने अपनी राजनीतिक यात्रा में अनेक उतार-चढाव देखें हैं. आज वे एक नए मोड़ पर खड़े हैं, जहाँ जेल यात्रा के बाद अब उनकी राजनीति की दिशा बदलती दिख रही है.

आजम खान का राजनीतिक सफर और समाजवादी युग

आजम खान का राजनीतिक सफर चार दशक से अधिक पुराना है. रामपुर से अपनी राजनीति की शुरुआत करने वाले आजम खान समाजवादी विचारधारा के प्रमुख स्तंभों में से एक रहे हैं. वे उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में कई बार अहम् जिम्मेदारियां सम्भाल चुके हैं. उनकी पहचान एक तेजतर्रार और विवादित नेता की रही है, जिन्होंने अपने बयानों और कार्यशैली से हमेशा सुर्खियाँ बटोरीं.

जेल यात्रा : राजनीतिक संघर्ष या साजिश ?

योगी सरकार के आने के बाद आजम खान पर कई गंभीर आरोप लगे. उनके ख़िलाफ़ विभिन्न मामलों में केस दर्ज हुए और लम्बे समय तक उन्हें जेल में रहना पड़ा. समर्थकों का मानना है कि यह राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित था, जबकि सरकार का दावा है कि उनके ख़िलाफ़ सभी क़ानूनी कार्यवाही न्यायसंगत थी. किसी भी स्थिति में, यह कहना गलत नहीं होगा कि जेल यात्रा ने उनकी राजनितिक स्थिति को कमजोर कर दिया.

आजम खान के कमल यात्रा की ओर बढ़ते कदम

आजम खान की राजनितिक भविष्यवाणी कठिन है, लेकिन यह स्पष्ट है कि वे एक अनुभवी नेता हैं और राजनीति में वापसी के लिए प्रयासरत हैं. हाल ही में कुछ राजनितिक संकेत मिले हैं, जो उनकी विचारधारा में सम्भावित बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं. क्या वे समाजवादी पार्टी से अलग राह चुनेंगे? क्या वे भारतीय जनता पार्टी या किसी अन्य दल के साथ नया समीकरण बनायेंगे ? इन सवालों के जवाब भविष्य के गर्भ में छुपे हैं.

योगी सरकार का दबाव और रणनीति

उत्तर प्रदेश की राजनीति में योगी सरकार का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है. क़ानून व्यवस्था को सुधारने के नाम पर कई नेताओं पर शिकंजा कसा गया है. आज़म खान भी इससे अछूते नहीं रहे. लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वे इस दबाव को सहन कर अपनी पुरानी धारा में लौटते हैं या नई राह अपनाते हैं.

राजनीति का मंझा हुआ खिलाड़ी

आज़म खान को राजनीति का मंझा हुआ खिलाड़ी कहा जाये तो गलत नहीं होगा. वे जानते हैं कि किस परिस्थिति में कौन सी चाल चलनी है. उनके अनुभव, वाक्पटुता और जनाधार को देखते हुए यह निश्चित है वे राजनीति में एक नई दिशा तलाशने की कोशिश करेंगे.
आज़म खान की यात्रा जेल से शुरू होकर अब नई राजनितिक सम्भावनाओं की ओर बढ़ रही है. यह देखना रोचक होगा कि क्या वे अपनी पुरानी विचारधारा पर कायम रहेंगे या बदलते समय के साथ नई दिशा अपनाएंगे. राजनीति में कोई भी स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता, सिर्फ समय और परिस्थिति तय करती है कि अगली चाल क्या होगी.

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सत्ता और विपक्ष धर्म को अफीम की तरह……

जर्मनी के महान दार्शनिक और चिंतक कार्ल मार्क्स ने धर्म को लेकर कहा था – “Religion is the opium of the people”. अर्थात धर्म लोगों के लिए अफ़ीम है।

दूसरे शब्दों में कहें तो कार्ल मार्क्स का यह मानना था कि धर्म एक आम इंसान के लिए वास्तव में अफ़ीम का काम करता है।

हालांकि मैं स्वयं मार्क्सवादी विचारधारा से पूर्णतः सहमत कभी नहीं हुआ, और शायद कभी हो भी नहीं सकता। परंतु भारत की आधुनिक राजनीति के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो वास्तव में धर्म को अफ़ीम की तरह ही इस्तेमाल किया जा रहा है।

दरअसल अफ़ीम की एक ख़ास बात यह होती है कि अफ़ीम का नशा करने के पश्चात व्यक्ति को अपने दर्द का एहसास बहुत कम होता है।
ठीक इसी प्रकार, एक साधारण और आम इंसान को धर्म का नशा जब चढ़ता है तो वह अपने वास्तविक दुःख -दर्द को कुछ समय के लिए भूल जाता है।

आज स्थिति कमोवेश ठीक ऐसी ही है। भारत की आम जनता महंगाई, बेरोजगारी, काला बाजारी, और भ्रष्टाचार के दर्द को धर्म के नशे में भुला बैठी है।

नित्य नए – नए करों (Tax) के बोझ के नीचे दबकर कराह रही आम जनता पर जब GST का चाबुक पड़ता है, तो उसकी उस पीड़ा को, उसके दर्द को धर्म की अफ़ीम सुंघाकर कम करने का हर संभव प्रयास किया जाता है।

ऐसा नहीं है कि केवल सत्ता पक्ष या एक पार्टी विशेष ही धर्म की अफ़ीम के इंजेक्शन लगा रही है, अपितु विपक्ष भी अपने दोनों हाथों में तुष्टिकरण और धर्म विशेष के इंजेक्शन लिए लोगों की भावनाओं से खेलता नज़र आ रहा है।

भारतीय समाज की मनोदशा की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहां पर “नियतिवाद” अर्थात भाग्यवाद को प्रधानता दी जाती है। अर्थात जो कुछ भी हो रहा है, वह तो पहले से ही निर्धारित है।

ग़रीब, कमज़ोर और लाचार इंसान अपनी पूरी ज़िन्दगी का दर्द केवल इन शब्दों के “मरहम” से ही मिटाता रहता है, कि उसके भाग्य में यही लिखा था।

यहां उल्लेखनीय है कि भारतीय दर्शन का सबसे महत्वपूर्ण दर्शन और हिन्दू सनातन आस्था का प्रतीक पवित्र भगवद्गीता इसके ठीक विपरीत संदेश देती है।

भगवद्गीता का दर्शन कर्म को प्रधान मानता है, न कि भाग्य अथवा नियति को प्रधान मानता है।

परंतु भारतीय जनमानस को धर्म की जिस अफ़ीम के सहारे छोड़ दिया गया है, वह उसे केवल और केवल मंदिर/मस्जिद/गुरुद्वारा/चर्च आदि में ही उलझाकर रखे हुए है।

किसी को भी अपने भविष्य की चिंता नहीं है, अपितु गड़े हुए मुर्दों को देखने को प्रत्येक व्यक्ति आतुर नज़र आता है।

मनोज चतुर्वेदी शास्त्री
समाचार – संपादक
उगता भारत
नोएडा से प्रकाशित
हिंदी समाचार पत्र